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Kuchh Apani Kahe, Kuchh Unaki Sune

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प्रेम के दो मुक्तक

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–१–

राग-रागिनी से सज्जित, उनकी धुन पर बजते हर साज/
नीला अम्बर हर्षित होकर, पुहुप वृष्टि करता है आज//
मणि-माणिक्य रत्न सब लेकर, धवल चांदनी है आई/
तिमिर छटा मेरे जीवन से, जबसे उनकी संगती पायी//
वाणी ऐसी मनमोहक, झंकृत कर देती मन के तार/
रीतिबद्ध कविता है वो, कहता मेरा मन बारम्बार//

—२—

सुरभित वातावरण हो उठा, बस एक तेरे आने के बाद|
मधुकर गूंज उठे उपवन में, तेरी एक झलक पाने के बाद|
नंदन वन का खिला कुसुम, या इंद्र सभा का है कोई|
त्रिवेणी भी जाग उठी, जो अब तक थी यूँ ही सोई |
पारस हो तुम ऐ प्राण-प्रिये, पर कैसे तुमको बतलाये|
पत्थर को भी यदि छू दो तुम, तो वो भी सोना हो जाए||||

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
November 22, 2013

अहो,,, सुन्दर..!

lalitpratapchhapar के द्वारा
November 28, 2013

आपको रचना पसंद आयी| आपका aabhar


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